जयकिशन की पुण्यतिथि: 41 की उम्र में थमा सफर, लेकिन आज भी जिंदा हैं उनकी अमर धुनें
जयकिशन पुण्यतिथि: हिंदी सिनेमा के संगीत जगत में शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने ऐसा मुकाम बनाया, जिसे आज भी याद किया जाता है। इस जोड़ी के मशहूर संगीतकार जयकिशन दयाभाई पंचाल का 12 सितंबर 1971 को महज 41 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। उनके निधन को 55 साल बीत चुके हैं, लेकिन उनकी बनाई धुनें आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।
संगीत के जुनून ने पहुंचाया मुंबई
जयकिशन का जन्म 4 नवंबर 1929 को गुजरात के बांसदा में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत में खास दिलचस्पी थी। उन्होंने संगीत की शिक्षा ली और हारमोनियम बजाने में भी महारत हासिल की। अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मुंबई पहुंचे, जहां शुरुआती दौर में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने एक फैक्ट्री में काम करते हुए फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने की कोशिश जारी रखी।
शंकर से मुलाकात बनी करियर का टर्निंग पॉइंट
जयकिशन की मुलाकात जब शंकर से हुई तो दोनों की दोस्ती जल्द ही संगीत की साझेदारी में बदल गई। शंकर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम बजाने का अवसर मिला। इसी दौरान राज कपूर की नजर भी दोनों की प्रतिभा पर पड़ी।
शंकर-जयकिशन ने शुरुआत में फिल्म आग में संगीतकार राम गांगुली के सहायक के तौर पर काम किया। इसके बाद 1949 में आई बरसात ने दोनों को रातोंरात हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में पहचान दिला दी।
राज कपूर के साथ रचा संगीत का सुनहरा दौर
बरसात की सफलता के बाद शंकर-जयकिशन ने कई सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया। आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी, अनाड़ी, संगम, सूरज, ब्रह्मचारी और मेरा नाम जोकर जैसी फिल्मों के गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी।
उनके संगीत से जुड़े कई गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। 'मेरा जूता है जापानी', 'आवारा हूं', 'प्यार हुआ इकरार हुआ', 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर' और 'जिंदगी एक सफर है सुहाना' जैसे गीतों ने हिंदी सिनेमा के संगीत को खास पहचान दी।
नौ बार मिला फिल्मफेयर सम्मान
शंकर-जयकिशन की जोड़ी को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए नौ बार फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। दोनों ने अपनी व्यक्तिगत पहचान से ज्यादा अपनी जोड़ी को महत्व दिया और कई बार यह सार्वजनिक नहीं किया कि किसी खास धुन को किसने तैयार किया था।
12 सितंबर 1971 को जयकिशन का निधन हो गया, लेकिन उनकी संगीत विरासत आज भी कायम है। यही वजह है कि दशकों बाद भी शंकर-जयकिशन की धुनें पुराने और नए, दोनों दौर के संगीत प्रेमियों को आकर्षित करती हैं।
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