सिरपुर को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान की राह, UNESCO की विश्व धरोहर अस्थायी सूची में शामिल हुआ छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक स्थल

21 Oct 2026 - 14:59
0 2
सिरपुर को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान की राह, UNESCO की विश्व धरोहर अस्थायी सूची में शामिल हुआ छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक स्थल

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित प्राचीन नगरी सिरपुर को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। महानदी के तट पर बसा सिरपुर अपने प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तियों और ऐतिहासिक स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है। इस सूची में शामिल होना सिरपुर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

सिरपुर का इतिहास प्राचीन दक्षिण कोसल की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्मों से संबंधित पुरातात्विक अवशेष मिले हैं, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विविधता को दर्शाते हैं। अब यूनेस्को की अस्थायी सूची में स्थान मिलने के बाद सिरपुर को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की दिशा में आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

राज्य में ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयासों के बीच यह उपलब्धि सामने आई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है।

केंद्रीय मंत्री ने किया था सिरपुर का निरीक्षण

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने यहां मौजूद प्राचीन स्मारकों, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का अवलोकन किया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने इन धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के साथ सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्रयास करने की बात कही थी।

सिरपुर की ऐतिहासिक पहचान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहां मिले बौद्ध विहारों, मूर्तियों, शिलालेखों और प्राचीन निर्माणों से तत्कालीन समाज, धार्मिक गतिविधियों तथा कला परंपराओं की जानकारी मिलती है। यही विविधता सिरपुर को पुरातत्व और इतिहास के अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है।

दक्षिण कोसल की राजधानी रहा है सिरपुर

प्राचीन काल में सिरपुर को श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। यह पाण्डुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के तट पर स्थित होने के कारण यह नगर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था।

शरभपुरीय शासकों प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से इस क्षेत्र के इतिहास के महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं। पाण्डुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में सिरपुर में मंदिरों, बौद्ध विहारों, सरोवरों और उद्यानों का निर्माण हुआ। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरणों में यहां बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है।

सिरपुर की एक प्रमुख विशेषता यहां विभिन्न धार्मिक परंपराओं का सहअस्तित्व है। शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्म से संबंधित अवशेष इस बात के प्रमाण हैं कि यह नगर लंबे समय तक विविध धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा।

लक्ष्मण मंदिर और प्राचीन स्थापत्य कला की पहचान

सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर भारतीय मंदिर स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है। लगभग सातवीं शताब्दी में निर्मित यह ईंटों से बना प्राचीन मंदिर अपनी वास्तुकला, कलात्मक अलंकरण और सूक्ष्म शिल्पांकन के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर की संरचना और दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां तत्कालीन शिल्पकारों की तकनीकी दक्षता को दर्शाती हैं।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मंदिर का निर्माण रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। मंदिर का निर्माणकाल लगभग 650 ईस्वी माना जाता है। इसके प्रवेश द्वार और बाहरी दीवारों पर विभिन्न पौराणिक प्रसंगों तथा भगवान विष्णु से संबंधित आकृतियों का अंकन मिलता है।

महानदी के तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर भी सिरपुर की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर परिसर में प्राचीन स्थापत्य खंड और कलात्मक प्रतिमाएं मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त सुरंग टीला और राम मंदिर के अवशेष भी इस क्षेत्र की ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाते हैं।

बौद्ध विहार और पुरातात्विक खोजों का महत्व

सिरपुर प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां हुए उत्खननों में अनेक बौद्ध विहारों के अवशेष मिले हैं। इनमें आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वास्तिक विहार प्रमुख हैं। इन संरचनाओं में भिक्षुओं के निवास, अध्ययन और धार्मिक गतिविधियों के लिए कक्षों की व्यवस्था थी।

वर्ष 2002-03 में डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन के दौरान तीवरदेव महाविहार के अवशेष सामने आए। लगभग 902 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला यह महाविहार अपनी संरचना, प्रवेश द्वार और कलात्मक शिल्प के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां जल निकासी की भूमिगत नालियों और व्यवस्थित कक्षों के अवशेष भी मिले हैं।

सिरपुर में विभिन्न उत्खननों के दौरान दो हजार से अधिक पुरावशेष मिलने का उल्लेख है। इनमें धातु प्रतिमाएं, प्राचीन सिक्के, आभूषण बनाने के उपकरण, मिट्टी के बर्तन, ताले, दीपक और अन्य वस्तुएं शामिल हैं। ये अवशेष प्राचीन नगर के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन को समझने में मदद करते हैं।

विश्व धरोहर का दर्जा मिलने की दिशा में अगला कदम

यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा मिलना नहीं है, बल्कि नामांकन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। इसके बाद संबंधित स्थल के ऐतिहासिक महत्व, संरक्षण व्यवस्था और निर्धारित मानकों के आधार पर आगे की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

सिरपुर की प्राचीन मंदिर परंपरा, बौद्ध विहार, दुर्लभ मूर्तिकला और विभिन्न धर्मों से जुड़ी विरासत इसे सांस्कृतिक पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है। भविष्य में इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ने से इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों की रुचि बढ़ने की संभावनाएं हैं। पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय स्तर पर रोजगार और पर्यटन सेवाओं के विकास के अवसर भी बन सकते हैं।

निष्कर्ष

महासमुंद जिले के सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया जाना छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब इसके संरक्षण, पुरातात्विक महत्व के दस्तावेजीकरण और आगे की नामांकन प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी होगा, ताकि सिरपुर की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया जा सके।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User