Trump Russia Oil Deal Row: रूस से जुड़े डीजल समझौते पर ट्रंप और रिपब्लिकन सीनेटरों में मतभेद, 18 अक्टूबर तक फैसला लेने की समयसीमा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रूस से जुड़े डीजल समझौते को लेकर अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने आशंका जताई है कि राष्ट्रपति का मौजूदा कदम रूस पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित कानून की भावना के विपरीत हो सकता है। वहीं, सीनेट में रिपब्लिकन व्हिप जॉन बारासो ने ट्रंप के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि संबंधित कानून का उद्देश्य राष्ट्रपति को रूस पर दबाव बनाने के लिए अतिरिक्त अधिकार देना है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब ट्रंप प्रशासन को रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों पर संभावित कार्रवाई को लेकर 18 अक्टूबर तक फैसला लेना है। संबंधित कानून के तहत राष्ट्रपति को कुछ देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया है। हालांकि, कानून में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद को लेकर विशेष प्रावधान हैं, जबकि डीजल जैसे रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों को उसी प्रावधान में शामिल नहीं किया गया है।
इस मुद्दे पर दोनों रिपब्लिकन नेताओं की अलग-अलग राय रविवार को अमेरिकी समाचार चैनलों एनबीसी और सीबीएस के कार्यक्रमों में सामने आई। एक ओर टिलिस ने कानून के पालन को लेकर सवाल उठाए, तो दूसरी ओर बारासो ने इसे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा बताया।
ट्रंप के फैसले पर थॉम टिलिस ने उठाए सवाल
एनबीसी के कार्यक्रम 'मीट द प्रेस' में पत्रकार क्रिस्टन वेल्कर ने नॉर्थ कैरोलिना के रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस से पूछा कि क्या ट्रंप का कदम 2022 में बने उस कानून का उल्लंघन हो सकता है, जो रूसी तेल के आयात पर रोक लगाने से संबंधित है। इस सवाल पर टिलिस ने कहा कि ऐसा होने की आशंका है। उनके मुताबिक, यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि राष्ट्रपति का मौजूदा रुख कानून की निर्धारित भावना से मेल नहीं खाता।
टिलिस ने अपने तर्क के समर्थन में लिंडसे ग्राहम के नाम से जुड़े रूस प्रतिबंध विधेयक पर सीनेट में हुए मतदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें सही याद है, तो इस विधेयक को 86 वोट मिले थे। उनके अनुसार, यह परिणाम दिखाता है कि रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर सीनेट में व्यापक समर्थन मौजूद था।
टिलिस ने यह भी कहा कि पिछले 24 घंटों में राष्ट्रपति के कदम और बयानों से उस विधायी प्रयास के उद्देश्य को नुकसान पहुंचने की आशंका है। उनका मानना है कि डीजल समझौते से जुड़ा फैसला रूस पर प्रतिबंध लगाने के लिए की जा रही कोशिशों को कमजोर कर सकता है।
छह अन्य सीनेटरों ने भी जारी किया संयुक्त बयान
रविवार को टिलिस ने छह अन्य सीनेटरों के साथ एक संयुक्त बयान पर भी हस्ताक्षर किए। इस बयान का नेतृत्व सीनेट की विदेश संबंध समिति की वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य जीन शाहीन ने किया। बयान में कहा गया कि ट्रंप का फैसला संबंधित कानून के प्रावधानों के खिलाफ जाता है और अमेरिकी प्रशासन को अपना रुख तत्काल बदलना चाहिए।
इस संयुक्त बयान पर रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स, लिसा मुर्कोव्स्की और जॉन कर्टिस ने भी हस्ताक्षर किए। इनके अलावा डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल और रॉन वाइडेन भी इस बयान में शामिल रहे।
इस तरह रूस से जुड़े प्रतिबंधों के मुद्दे पर केवल विपक्षी डेमोक्रेट नेताओं ने ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सदस्यों ने भी राष्ट्रपति के फैसले पर चिंता जताई। हालांकि, इन बयानों में भारत का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। इसके बावजूद 18 अक्टूबर की समयसीमा को भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह समयसीमा रूसी तेल के बड़े खरीदारों पर संभावित अमेरिकी कार्रवाई से जुड़ी है।
जॉन बारासो ने ट्रंप के कदम का किया बचाव
सीबीएस के कार्यक्रम 'फेस द नेशन' में एंकर मार्गरेट ब्रेनन ने रिपब्लिकन सीनेटर और सीनेट में पार्टी के व्हिप जॉन बारासो से इस कानून को लेकर सवाल किया। ब्रेनन ने पूछा कि जब राष्ट्रपति को 18 अक्टूबर तक रूसी तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई पर फैसला करना है, तो क्या मौजूदा कदम उस कानून के उद्देश्य को कमजोर नहीं करता, जिसके पक्ष में बारासो ने स्वयं मतदान किया था।
इसके जवाब में बारासो ने कहा कि कानून का मकसद राष्ट्रपति को अधिक विकल्प और अधिकार उपलब्ध कराना था। उन्होंने तर्क दिया कि इन अधिकारों का इस्तेमाल रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने के लिए अतिरिक्त साधन के रूप में किया जा सकता है।
बारासो के अनुसार, यह कदम रूस पर दबाव बढ़ाने और संबंधित क्षेत्र में दीर्घकालिक समाधान निकालने की कोशिश का हिस्सा है। इस प्रकार, जहां टिलिस ने कानून के अनुपालन और प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए, वहीं बारासो ने राष्ट्रपति के फैसले को दबाव बनाने की व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा।
क्या है लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग एक्ट 2026?
लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 को 18 सितंबर को कानून बनाया गया था। इसके सेक्शन 113 के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया है, जो रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं और खरीद जारी रखते हैं।
हालांकि, यह अधिकार लागू करने का निर्णय राष्ट्रपति के पास है। कानून के अनुसार, यदि राष्ट्रपति कांग्रेस को प्रमाणित करते हैं कि शुल्क में छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वे संबंधित शुल्क से छूट भी दे सकते हैं। इसलिए इस कानून के तहत संभावित कार्रवाई का दायरा केवल प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कुछ परिस्थितियों में राहत देने का विकल्प भी मौजूद है।
इस बीच, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने रविवार को फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि ग्राहम कानून डीजल की खरीद पर प्रतिबंध लगाता है, ऐसा दावा करने वाले लोग गलत हैं। कानून की धारा 113 में रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद का उल्लेख है, लेकिन डीजल जैसे रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों को इस प्रावधान में शामिल नहीं किया गया है। यही अंतर डीजल समझौते को लेकर चल रही बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
18 अक्टूबर की समयसीमा पर टिकी नजरें
रूसी तेल के बड़े खरीदारों पर संभावित कार्रवाई को लेकर 18 अक्टूबर की समयसीमा नजदीक आने के साथ अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम पर ध्यान केंद्रित हो गया है। एक तरफ कुछ सीनेटर मौजूदा फैसले को कानून की भावना के विपरीत मान रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ बारासो जैसे नेता इसे रूस पर दबाव बनाने का विकल्प बता रहे हैं।
फिलहाल, इस विवाद के केंद्र में कानून की व्याख्या, राष्ट्रपति के अधिकार और डीजल जैसे रिफाइंड उत्पादों की कानूनी स्थिति है। 18 अक्टूबर तक होने वाला फैसला यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रशासन रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों के खिलाफ किस तरह की कार्रवाई करने पर विचार करता है।
निष्कर्ष
रूस से जुड़े डीजल समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन सीनेटरों के बीच मतभेद सामने आने से यह मुद्दा चर्चा में है। थॉम टिलिस ने कानून के पालन पर सवाल उठाए हैं, जबकि जॉन बारासो ने इसे रूस पर दबाव बनाने का तरीका बताया है। अब 18 अक्टूबर की समयसीमा तक अमेरिकी प्रशासन का फैसला महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि इससे रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों पर संभावित शुल्क और प्रतिबंधों की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
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