भारत में दशहरा मनाने के 6 अनोखे तरीके: कहीं रावण दहन, तो कहीं 75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा
दशहरा या विजयादशमी भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत, धर्म की स्थापना और अन्याय पर विजय का प्रतीक माना जाता है। देश के अधिकांश हिस्सों में इस दिन भगवान राम की रावण पर विजय की याद में रावण दहन किया जाता है, जबकि कई क्षेत्रों में यह त्योहार मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ा हुआ है। हालांकि, भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण दशहरे को मनाने के तरीके हर क्षेत्र में अलग-अलग दिखाई देते हैं।
दिल्ली और उत्तर भारत में रामलीला के मंचन तथा रावण दहन की परंपरा प्रमुख है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के समापन पर मां दुर्गा को विदाई दी जाती है, तो कर्नाटक के मैसूर में देवी चामुंडेश्वरी की शाही सवारी निकाली जाती है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थानीय देवी-देवताओं का भव्य समागम होता है। वहीं, छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, जहां लगभग 75 दिनों तक उत्सव चलता है और रावण का पुतला नहीं जलाया जाता।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे की ये परंपराएं बताती हैं कि एक ही त्योहार किस तरह स्थानीय आस्था, इतिहास और लोक संस्कृति के साथ अलग-अलग स्वरूप धारण कर सकता है।
दिल्ली और उत्तर भारत: रामलीला के बाद होता है रावण दहन

दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के कई शहरों में दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण रामलीला और रावण दहन होता है। नवरात्र के दौरान स्थानीय कलाकार रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन करते हैं। इन प्रस्तुतियों में भगवान राम के वनवास, सीता हरण और रावण के साथ युद्ध जैसे प्रसंगों के माध्यम से रामकथा को दर्शकों तक पहुंचाया जाता है।
विजयादशमी के अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर उत्तर प्रदेश के अयोध्या और वाराणसी के रामनगर तक, रामलीला की परंपरा दशहरे के उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष रूप से रामनगर की रामलीला अपनी विस्तृत प्रस्तुति और लंबे समय तक चलने वाले आयोजन के लिए जानी जाती है।
पश्चिम बंगाल: सिंदूर खेला और मां दुर्गा की विदाई

पश्चिम बंगाल में विजयादशमी दुर्गा पूजा के समापन का अवसर है। कोलकाता सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में कई दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और भव्य पंडालों में धार्मिक आयोजन होते हैं। विजयादशमी पर इन उत्सवों का समापन मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के साथ होता है।
इस दिन सिंदूर खेला की परंपरा भी विशेष आकर्षण रहती है। परंपरागत रूप से विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर देवी को विदाई देती हैं। इस दौरान श्रद्धा और भावुकता का माहौल दिखाई देता है। उत्तर भारत की तरह यहां रावण दहन मुख्य आयोजन नहीं है, बल्कि मां दुर्गा की विजय और उनकी विदाई इस पर्व का केंद्र रहती है।
मैसूर: देवी चामुंडेश्वरी की शाही सवारी

कर्नाटक के मैसूर में दशहरे को मैसूर दशरा के नाम से जाना जाता है। यहां यह उत्सव देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय से जुड़ा हुआ है। दशहरे के दौरान मैसूर पैलेस को रोशनी से सजाया जाता है, जिससे ऐतिहासिक महल की भव्यता देखते ही बनती है।
इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण जंबू सवारी है। इसमें देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को सजे हुए हाथी पर स्वर्ण हौदे में विराजमान कर शोभायात्रा निकाली जाती है। पारंपरिक वेशभूषा, सजे हुए हाथी, संगीत और सांस्कृतिक झांकियां इस आयोजन को विशिष्ट बनाती हैं। मैसूर का दशहरा धार्मिक आस्था के साथ अपनी शाही परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है।
कुल्लू: एक सप्ताह तक जुटते हैं सैकड़ों देवी-देवता

हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में दशहरा मनाने की परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग है। यहां उत्सव विजयादशमी के दिन शुरू होता है और लगभग एक सप्ताह तक चलता है। जबकि कई क्षेत्रों में विजयादशमी के दिन ही दशहरे का समापन हो जाता है, कुल्लू में इसी दिन धार्मिक आयोजनों की शुरुआत होती है।
इस दौरान कुल्लू और आसपास के क्षेत्रों से स्थानीय देवी-देवताओं की पालकियां और रथ उत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं। मुख्य आयोजन में भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा निकाली जाती है। बड़ी संख्या में देवी-देवताओं का एकत्र होना इस उत्सव की विशेष पहचान है। यहां दशहरा धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय रीति-रिवाजों और लोक संस्कृति को भी प्रदर्शित करता है।
बस्तर दशहरा: 75 दिनों का उत्सव, रावण दहन की परंपरा नहीं

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला दशहरा देश के सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। जगदलपुर में आयोजित होने वाला बस्तर दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका मुख्य आधार भगवान राम और रावण की कथा नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं और आदिवासी समुदाय की परंपराएं हैं।
उत्तर भारत के दशहरे से अलग, यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। उत्सव के दौरान रथ से जुड़े अनुष्ठान, स्थानीय देवी-देवताओं का आगमन और सामुदायिक आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस पर्व का स्वरूप बस्तर की विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और सदियों से चली आ रही लोक परंपराओं को सामने लाता है।
बस्तर दशहरा यह भी दर्शाता है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में त्योहारों का महत्व केवल प्रचलित धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्थानीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक आस्था से भी जुड़े होते हैं।
कोटा: रावण दहन के साथ लगता है विशाल दशहरा मेला
राजस्थान के कोटा में दशहरे के अवसर पर धार्मिक आयोजनों के साथ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। यहां दशहरा मेले की परंपरा 18वीं सदी से चली आ रही है। विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन प्रमुख आकर्षण होता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
मेले में धार्मिक कार्यक्रमों के अलावा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लोक संगीत और विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। इस तरह कोटा का दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक मेल-मिलाप का अवसर भी बनता है।
निष्कर्ष
भारत में दशहरा मनाने की परंपराएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन प्रत्येक आयोजन अपने क्षेत्र की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। कहीं रामलीला और रावण दहन के जरिए अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, तो कहीं मां दुर्गा की आराधना और स्थानीय देवी-देवताओं के समागम के माध्यम से उत्सव मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा इस विविधता का विशेष उदाहरण है, जहां 75 दिनों तक चलने वाला उत्सव रावण दहन के बिना संपन्न होता है। यही विविधता भारत के त्योहारों को विशिष्ट पहचान देती है।
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