Mohan Bhagwat Vijayadashami Speech: मोहन भागवत के भाषण की 10 बड़ी बातें, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी पर दिया जोर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के समापन और विजयादशमी उत्सव के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश, समाज और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। अपने संबोधन में उन्होंने संघ के 100 वर्षों के सफर, भारत की सांस्कृतिक पहचान, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश के भविष्य को मजबूत बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा।
मोहन भागवत ने अपने भाषण में नई पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों, नशे की समस्या, OTT प्लेटफॉर्म्स पर नियंत्रण की जरूरत और सामाजिक आंदोलनों के दौरान संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने जैसे विषयों पर भी चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने भारत की विविधता, सनातन संस्कृति और विश्व स्तर पर देश की भूमिका को लेकर अपनी बात रखी। उनके संबोधन के प्रमुख बिंदुओं में स्वदेशी का आचरण, नागरिक अनुशासन, पर्यावरण संरक्षण और समाज में आपसी सद्भाव जैसे विषय शामिल रहे।
स्वदेशी और 'स्व' के बोध पर जोर
मोहन भागवत ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को समझने और स्वदेशी को जीवन में अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि देश के संविधान में 'हम भारत के लोग' का विचार विविधताओं के बावजूद भावनात्मक एकता को दर्शाता है। उनके अनुसार, इस आपसी जुड़ाव को लगातार मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने स्वदेशी को केवल वस्तुओं के उपयोग तक सीमित रखने के बजाय अपने देश की पहचान, परंपराओं और आत्मबोध से जोड़ने की बात कही।
भागवत ने संत रविदास की 650वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के कार्यों का स्मरण करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। उन्होंने बंगाल के राज नारायण बसु का भी उल्लेख किया, जिनके प्रेरित किए गए 'हिंदू मेला' का उद्देश्य समाज में स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना को जागृत करना था। उनके जन्म का 200वां वर्ष भी इस संदर्भ में उल्लेखित किया गया।
विविधता, सनातन संस्कृति और सामाजिक समरसता
संघ प्रमुख ने भारत की विविधता को देश की विशेषता बताते हुए सनातन संस्कृति को राष्ट्रीय एकता का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि 'हिंदू भाव' किसी एक पूजा पद्धति, भाषा, खान-पान या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, यह दृष्टि आध्यात्मिकता, मानवता और विश्वबंधुत्व से जुड़ी है।
समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उन्होंने पांच प्रमुख विषयों पर ध्यान देने की अपील की। इनमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन शामिल हैं। उन्होंने इन मूल्यों को केवल विचारों तक सीमित रखने के बजाय व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अपनाने पर जोर दिया।
नई पीढ़ी, OTT प्लेटफॉर्म और नशे की चुनौती
मोहन भागवत ने नई पीढ़ी को उचित और अनुचित के बीच अंतर समझाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि परिवार, विद्यालय और सामाजिक वातावरण से मिलने वाले संस्कारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में बच्चों तथा युवाओं को उपलब्ध जानकारी का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना सिखाना जरूरी है।
उन्होंने OTT प्लेटफॉर्म्स पर उचित नियंत्रण की आवश्यकता का भी उल्लेख किया। भागवत ने कहा कि दूसरे देशों में डिजिटल माध्यमों से जुड़े अनुभवों के बाद कुछ नियम और प्रतिबंध लागू किए गए हैं। भारत में भी विशेष रूप से OTT प्लेटफॉर्म्स को लेकर ऐसी आवश्यकता महसूस की जा रही है।
नशे की समस्या पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि नशीली दवाओं की आदत नई पीढ़ी के सामने गंभीर चुनौती है। इससे निपटने के लिए शासन-प्रशासन और समाज को समय रहते प्रयास शुरू करने चाहिए। उन्होंने अभिभावकों से युवाओं में सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने तथा स्वयंसेवकों से इस समस्या के विरुद्ध देशव्यापी जन-जागरूकता और प्रतिरोध खड़ा करने के प्रयास करने की बात कही।
नेपाल की त्रासदी और संतुलित विकास की जरूरत
अपने संबोधन में भागवत ने नेपाल में आई भीषण त्रासदी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस घटना के पीछे पूरे हिमालयी क्षेत्र में हुए एकांगी विकास की भूमिका पर विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने भारत, तिब्बत, भूटान और चीन का उल्लेख करते हुए विकास के लिए समग्र और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
उनके अनुसार, विकास की प्रक्रिया में व्यापक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। यह मुद्दा केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र के भविष्य और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ा है।
विभाजनकारी ताकतों और आंदोलनों पर क्या बोले भागवत?
मोहन भागवत ने भारत की एकता और सामाजिक सद्भाव को कमजोर करने वाली ताकतों के प्रति सतर्क रहने की बात कही। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ शक्तियां भारत की प्रगति को प्रभावित करने और आंतरिक विभाजन पैदा करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने कहा कि देश और समाज को ऐसी परिस्थितियों में विवेक तथा एकजुटता बनाए रखने की आवश्यकता है।
आंदोलनों के संबंध में उन्होंने कहा कि समाज में समस्याएं और व्यवस्था की कमियां होने के कारण विरोध-प्रदर्शन होना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों का उद्देश्य समाधान निकालना होना चाहिए। उन्होंने आंदोलनकारियों, शासन-प्रशासन और राजनीतिक नेताओं से संविधान, कानून और मर्यादित व्यवहार का पालन करने की अपील की। उनके अनुसार, राजनीतिक लाभ, वोट या सस्ती लोकप्रियता की इच्छा के कारण समाज में द्वेष और विभाजन नहीं बढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
विजयादशमी उत्सव पर अपने संबोधन में मोहन भागवत ने सांस्कृतिक पहचान, स्वदेशी, सामाजिक समरसता, नई पीढ़ी की चुनौतियों और संतुलित विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। उन्होंने नागरिकों से अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव लाने की अपील की। उन्होंने कहा कि भारत का परम वैभव और विश्वगुरु बनने की दिशा में प्रगति प्रत्येक नागरिक के पुरुषार्थ और कर्तव्यपालन से ही संभव है।
FAQ:अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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