निगरी की पहाड़ियों पर किसका ‘खेल’? रात में दौड़ते हाइवा, शिकायतों के बाद भी नहीं थमा मुरम खनन
जबलपुर। कभी दूर से अपनी ऊंचाई के कारण पहचान बनाने वाली बरगी क्षेत्र के निगरी गांव की मुरम की पहाड़ियां अब खनन के गहरे निशान समेटे नजर आ रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि बीते तीन-चार वर्षों में यहां की कई पहाड़ियां लगातार खोदी जाती रहीं और देखते ही देखते उनका स्वरूप बदल गया। दावा है कि दिन ढलते ही कथित खनन गतिविधियां तेज हो जाती हैं और मुरम से लदे हाइवा दूसरे इलाकों की ओर निकल जाते हैं।
रात के अंधेरे में बढ़ती है वाहनों की आवाजाही
निगरी के ग्रामीणों के मुताबिक रात होते ही खनन वाले इलाके में वाहनों की आवाजाही बढ़ जाती है। आरोप है कि पहाड़ियों से मुरम निकालकर उसे अन्य स्थानों पर ले जाकर बेचा जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि इस पूरी गतिविधि को लेकर कई बार प्रशासन और खनिज विभाग का ध्यान आकर्षित किया गया, लेकिन कथित तौर पर कार्रवाई का असर जमीन पर दिखाई नहीं दिया।
शिकायतकर्ता मिठाई लाल पटेल और ग्रामीण धर्मेंद्र पटेल के अनुसार पिछले करीब तीन वर्षों में आधा दर्जन से अधिक शिकायतें की जा चुकी हैं। इसके बावजूद ग्रामीणों का दावा है कि मुरम खनन का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुका।
पहाड़ियां कितनी घटीं, अब पैमाइश से खुलेगा सच?
ग्रामीण अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे मामले की मौके पर जांच और पैमाइश की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशासन को मौके पर पहुंचकर यह पता लगाना चाहिए कि पिछले तीन-चार वर्षों में यहां से कितनी मात्रा में मुरम निकाली गई।
साथ ही यह भी जांच का विषय है कि जिस जमीन पर खनन हुआ, वह किस श्रेणी की है और वहां मुरम निकालने की वैध अनुमति थी या नहीं। यदि अनुमति थी तो उसकी सीमा क्या थी और यदि अनुमति नहीं थी तो इतनी लंबी अवधि तक गतिविधियां कैसे चलती रहीं?
सरपंच-सचिव ने जताई अनभिज्ञता
गांव में पड़ताल के दौरान ग्रामीणों ने बड़े पैमाने पर मुरम निकाले जाने का दावा किया। गांव के बच्चों ने भी खनन वाले स्थानों की ओर इशारा किया। हालांकि गांव की सरपंच रेखा कोल और सचिव जयश्री ने मुरम खनन की जानकारी होने से इनकार किया।
वहीं, ग्रामीणों की ओर से की गई शिकायतों में सरपंच और सचिव पर कथित संरक्षण के आरोप लगाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
खनिज रिकॉर्ड और DSR से मिल सकता है अहम सुराग
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन के खनिज रिकॉर्ड और जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट यानी DSR महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। रिकॉर्ड से यह पता लगाया जा सकता है कि निगरी क्षेत्र में मुरम खनन के लिए किसी व्यक्ति या संस्था को अनुमति दी गई थी या नहीं।
इसके साथ ही मौके की मौजूदा स्थिति और पुराने रिकॉर्ड का मिलान किया जाए तो यह भी सामने आ सकता है कि वर्षों के दौरान पहाड़ियों के स्वरूप में कितना बदलाव आया है और कितनी मात्रा में मुरम निकाली गई।
पहले भी अवैध खनन को लेकर कार्रवाई
जबलपुर जिले में अवैध खनन, परिवहन और भंडारण के खिलाफ पहले भी कार्रवाई हो चुकी है। जून 2026 में सामने आई जानकारी के मुताबिक करीब पांच महीनों में अवैध खनन से जुड़े मामलों में 14 करोड़ 60 लाख रुपये से अधिक का अर्थदंड लगाया गया था। इस दौरान पोकलेन, जेसीबी, हाइवा, डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉली जैसे वाहन भी जब्त किए गए थे।
बरगी क्षेत्र में अवैध रेत खनन को लेकर भी पहले सवाल उठ चुके हैं। वर्ष 2025 में नर्मदा नदी से बरगी बांध तक अवैध रेत खनन की शिकायत पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने स्वतः संज्ञान लिया था। संयुक्त जांच में 55 घनमीटर अवैध रूप से संग्रहित रेत जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
अब बड़ा सवाल—कहां गईं निगरी की पहाड़ियां?
निगरी के ग्रामीणों के आरोपों की असल तस्वीर जांच के बाद ही साफ होगी, लेकिन सवाल कई हैं। अगर खनन वैध था तो उसकी अनुमति और निर्धारित सीमा क्या थी? अगर अवैध था तो शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और सबसे अहम—पिछले वर्षों में पहाड़ियों से निकाली गई मुरम की मात्रा कितनी है?
अब निगाहें जिला प्रशासन और खनिज विभाग की संभावित जांच पर टिकी हैं। मौके की पैमाइश और सरकारी रिकॉर्ड की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निगरी की पहाड़ियों का बदलता स्वरूप महज प्राकृतिक बदलाव है या इसके पीछे वर्षों से चल रहा कथित मुरम खनन जिम्मेदार है।
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